Friday, May 31, 2019

जातीवादी मानसिकता का परिणाम है सपा– बसपा का पराजय


उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का गठबंधन हुवा। यह गठबंधन केवल दो या तिन पार्टीयोंका नहीं था, वह था जाट-दलित-ओबीसी और मुस्लिम समुदाय का। लगता था यह गठबंधन भाजपा को पराजित करेगा। इसके पीछे की कहानी भी सटीक और गणनात्मक थी। वह थी गोरखपुर और  फूलपुर में  गठबंधन उमेदवारोंकी अप्रत्याशित जित। दोनों जगह क्रमश: मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य गढ़ के तौर पर थी। गठबंधन के जमीनी सामाजिक और जातीय आकड़ोंका पलड़ा भाजपा से कई अधिक था। लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन जितने की समाजशास्त्रियों तथा चुनावी पंडितो की धारणा धरातल पर ही रह गई।  

आकड़ों के विश्लेषण  पता चलता है की, कांग्रेस गठबंधन न होने से दस सीटो पर सपा-बसपा को नुकसान हुवा। भाजपा का वोट प्रतिशत 2014 के मुक़ाबले 42.3 प्रतिशत से बढ़कर 50.7 प्रतिशत होकर 62 सीटो पर जीत हासिल हुई। जब की सपा और बसपा का सामूहिक प्रदर्शन खराब रहा।2019 में सपा-बसपा ने जिन सीटो पर चुनाव लड़ा,  उसमें क्रमशः वोट शेअर 38.4 प्रतिशत और 40.8 प्रतिशत था। जो कुल वोट शेयर 39.6 प्रतिशत है। 10 सीटों के साथ बसपा का स्ट्राइक रेट 26.3 प्रतिशत है।  जबकि 5 सीटो के साथ सपा का स्ट्राइक रेट 13.5 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है की, समाजवादी पार्टी के वोटरोने गठबंधन का साथ नहीं निभाया। (आधार: द्विवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा)
जैसेही सपा बसपा का गठबंधन घोषित हुवा, वैसेही भाजपाने छोटी जातिंयोपर  डोरे डालना चालु कर दिया था. उत्तर प्रदेश में ओबीसी में 79 उपजातिया है. भाजपाने यादव जातियोंकों छोड़ मुख्यत: कुर्मी (4.5%), लोध(2.1%), निषाद(2.4%), गुज्जर(2%), तेली(2%), कुम्हार(2%), नाई(1.5%), सैनी(1.5%), कहार(1.5%), काछी(1.5%) इन जातियोंको सत्ता में भागीदारी के सपने दिखाए। इन पिछड़ोंका भाजपा को  26 से 27 प्रतिशत वोट प्राप्त हुवा । संघ और भाजपाने ऐसी धारा चलाई जहा संघ के घेरे में न जानेवाली जातिया भी चली गई। वही, उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियोंका वोट शेयर 22 से 23 प्रतिशत है। अनु. जातियोंमे 65 उपजातियाँ है। यहापर भी भाजपाने जाटव को छोड़ गैरजाटव पासी(3.2%), खटिक(1%), धोबी(1.4%), कोरी (1.3%), वाल्मीकि(1%) समुदाय को साथ लिया।  इन जातियोंका 9 से 10 प्रतिशत वोट भाजपा को गया। इस तरह अनु.जाती और पिछड़ो का कुल 37 प्रतिशत वोट भाजपा को मिला।  

ऐसा क्या हुवा की, सपा को केवल 5 सीट और बसपा 10 सीटो तक सिमट गई। 78% प्रतिशतवाला यह गठबंधन आखिर क्यों पराजित हुवा। बहुजनवाद की धारणा क्यों नहीं चली? प्रधानमंत्री मोदी ने कह दिया, अंकगणित की जगह केमेस्ट्री ने काम किया. सच में, क्या मोदीजी की जित केमेस्ट्री से हुई है? या गठबंधन की हार जातिवादी मानसिकता से? यह देखना जरूरी है। मोदीजी के केमेस्ट्री के तथ्यांश कुछ इस प्रकार है, मोदीजी और अमित शहा मजे हुए रणनीतिकार है। साम, दाम, दंड, भेद, लालूच और भावुकतामें वे माहिर है। मोदीजी के निति को विरोधी पार्टिया समझ नहीं सकी। वे अपने गणिती आकड़ों में ही मशगूल रहे। मोदी-शहा ने चुनावी प्रचारोमे धर्म, हिन्दुत्व और मंदिर की राजनीति की।  अनुसूचित जाती का भाग रहे वाराणसी के संत रैदासजी के  मंदिर में लंगर के लिए मोदीजी बैठ गए थे।  उन्होंने “समरसता भोज” नामसे अनु.जाती-पिछड़ोंके के घर भोज के लिए अपने नेताओंको कहा। मोदीजी भलेही दोषियोपर कार्यवाही न करे, लेकिन दलितोंकी हत्या पर भावुक होकर रो देते है। वे मुसलमानो के लिंचिग पर चुप रहते है। यह हिंदूओके लिए एक सीधा मेसेज होता है। वे खुद को गरीब से भी गरीब बताते है। ऊन्होने कुंभ मेले में सफाई कर्मचारीयोंके पैर धोकर वाल्मिकी समाज को अपनेपन का मेसेज दे दिया। सफाई कामागारोंके लिए यह प्रसंग सपनों से कम नहीं था।
दूसरा, अमित शहाने बहराईच में राजभर जाती के राजा सोहेलदेव के मूर्ति का अनावरण किया. उन्होंने सोहेलदेव को हिंदू रक्षक कहकर सोमनाथ मंदिर तोड़ने आये मुसलमान राजाओंको पराजित करनेका दावा किया। यह कहकर अमित शहा ने पिछडोके वोट बैंक को गोलबंद करनेका काम किया। तीसरा भाजपा ने गैर यादव समुदाय को समाजवादी पार्टी से और गैर जाटव समुदाय को बहुजन समाज पार्टी से तोड़ने की रणनीति बनाई। भाजपा ने केशवप्रसाद मौर्या द्वारा अनु.जाती एंव पिछडों के 150 सम्मलेन करवाए। चौथा, चुनाव के समय में नीरव मोदी को अरेस्ट किया गया। भाजपाने इसका भी फायदा उठाया। बालाकोट में हुए सैनिकी कार्यवाही को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ा। इन सारे मुद्दोने मोदीजी को जित दिलाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। ईव्हीएम मशीनो का रोल इस लेखमें प्रस्थावित नहीं है।
भाजपा के विजयो में हमेशा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद्, वनवासी कल्याण संघ और दुर्गा वाहिनी जैसे संघटनाओ का हाथ रहा है।  इन संघटनाओ के कार्यकर्ता केडर बेस होते है। जिनका केडर मजबूत होता है, उस पार्टी को चुनावो में हराना कठिन है। यह भविष्य में भाजपा विरोधियोंके लिए बड़ी चुनौती है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में कोई केडर बेस कार्यकर्ता और सामाजिक संघठन नहीं है। समय आनेपर गांधी फॅमिली छोड़ सभी कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हो सकते है। क्योंकि कांग्रेसी नेताओंके लिए विचारधारा नहीं सत्ता महत्वपूर्ण होती है।  बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मा.कांशीराम ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ विभिन्न सामाजिक संस्थागत केडर बनाया था।  कांशीरामजी फ़क़ीर के तौरपर थे। इसीलिए बहुजन समाज उनकी छाया बन गया था। लेकिन मायावती द्वारा बसपा को संभालतेही केडर को ख़त्म किया गया।  राज्यों में जनाधारवाले नेताओंको पदों से हटा दिया। कांशीरामने बहुजन समाज के जिन छोटे छोटे घटकों को साथ लिया उसे भी तोड़ा गया। ‘जिसकी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी’ इस नारे को भुला दिया गया। बसपा में युवा और महिला के भागीदारी को महत्त्व नहीं दिया जाता। कांशीराम द्वारा निर्माण ढाचे को गिरा दिया गया है। मायावती पर पिछड़ी जाति के नेताओं की अनदेखी करने और ऊंची जाति को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। केवल आरक्षित सीटो पर दलितोंकों तिकीट दिया जाता है। बसपा में भाई-भतीजावाद वाद का आरोप अक्सर लग रहा है। इन सबका असर चुनावी नतीजो पर होना संभव क्यों नहीं है?
सपा-बसपा गठबंधन की हार ‘जातीवादी मानसिकता’ के कारण हुई है। इसे नकारा नहीं जा सकता। मायावती ने खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी घोषित करना गठबंधन के पराजय का कारण बन गया। भारत की जातीवादी मानसिकता इतनी प्रबल है की वह सरलता से किसीभी दलित को प्रधानमंत्री बनने नहीं देगी।  मायावती प्रधानमंत्री न बने इसीलिए यादवो और नॉन यादवोने भाजपा को वोट दिया। इसके स्पष्ट संकेत मिलते है। संघीय संस्थाओंने इसका प्रचार भी किया।  मायावती के प्रधानमंत्री बनने के डर से यादवो ने समाजवादी पार्टीको भी वोट नही दिए। यही फर्क है अमेरिकन और भारत की जनता में, अमेरिकन जनता बराक ओबामा को अपना अध्यक्ष बना सकती है, लेकिन भारत की जनता आज भी उच्च-नीच के दलदल में फसी हुई है। भारत की पुरानी जातीवादी सामाजिक सरचना आज भी टस से मस नहीं हुई है। उत्तरोत्तर संघकाल में वह अधिक मजबूत बनेगी। आज भारत का भविष्य अंधेरों से टकरा रहा है। पता नहीं, उजालो के दिये कब   बंद कर दिए जाएंगे ?   

बापू राऊत,
मुंबई
9224343464

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