जिस मुंबई महानगर पालिका चुनाव पर पूरे देश की नजर थी, उसमें बड़ा उलटफेर हुआ है। 33 वर्षों से बाला
साहेब ठाकरे के प्रभाव में रही बीएमसी अब भारतीय जनता पार्टी के पास चली गई है।
हालांकि परिणाम बताते हैं कि मुंबई में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का आधार अभी भी
मजबूत है। यदि भाजपा के कुछ नगरसेवक बिनविरोध निर्वाचित न हुए होते, तो संभवतः मुंबई महानगर पालिका उद्धव ठाकरे के पास ही रहती।
जिस मतपत्र पर NOTA को भी एक उम्मीदवार माना
जाता है, वहाँ बिना चुनाव के
बिनविरोध नगरसेवक चुने जाना नैतिकता के विरुद्ध है। नागरिक समाज, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर ध्यान देना
चाहिए। NOTA के लिए आंदोलन करने वाले
अण्णा हज़ारे और उनकी टीम आज कहाँ हैं?
उनकी
विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है और इतिहास को उनकी भूमिका का तथ्यात्मक
मूल्यांकन करना चाहिए।
महानगर पालिका चुनावों में ओवैसी की एमआईएम ने अच्छा
प्रदर्शन किया है और उनके 114 नगरसेवक चुने गए हैं।
मुस्लिम समाज की मानसिकता में यह बड़ा परिवर्तन है। कुछ राष्ट्रीय दलों के लिए यह
चेतावनी हो सकती है, लेकिन भविष्य में मुस्लिम
समाज राजनीतिक रूप से अकेला भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, आंबेडकरी राजनीति बिखर चुकी है और बसपा तथा वंचित बहुजन
आघाड़ी को सीमित सफलता मिली है। यह फिर सिद्ध हुआ कि आंबेडकरी गुटों की एकता के
बिना आंबेडकरी राजनीति सफल नहीं हो सकती। तथाकथित आंबेडकरवादी गुट प्रगतिशील और
स्थापित दोनों दलों के साथ गठबंधन करते हैं, जबकि स्थानीय
स्तर पर सौदेबाज नेता अपनी सुविधा के अनुसार पर्चे और व्हाट्सऐप के माध्यम से
मतदान निर्देश जारी करते हैं। परिणामस्वरूप आंबेडकरी मत नेतृत्वहीन हो चुका है।
सामाजिक मुद्दों पर एकजुटता राजनीति में उपयोगी नहीं होती—यह फिर सिद्ध हुआ है।
प्रांतीय राजनीति की बात करें तो शरद पवार का प्रभाव अब
समाप्ति की ओर है। उम्र के कारण वे सक्रिय नहीं रह पाएँगे। उनकी कार्यशैली न तो
अजित पवार में है और न ही सुप्रिया सुळे में, इसलिए उनका
भविष्य बारामती तक सीमित रह पाएगा या नहीं, यह प्रश्न है।
मराठा और ओबीसी समाज पर हिंदुत्व और धर्म के माध्यम से भाजपा और संघ ने मजबूत पकड़
बनाई है। हिंदुत्व, धर्म, सत्संग और कीर्तन ने भाजपा और संघ को गाँव–गाँव तक पहुँचाया
है। इसलिए मराठा मतों पर पवार गुट का वर्चस्व कम हुआ है—यह पुणे, पिंपरी–चिंचवड़ और कोल्हापुर के परिणामों से स्पष्ट है।
ओबीसी समाज एकसमान नहीं है; वह अनेक
जातियों का समूह है। इसलिए पूरे ओबीसी समाज का एक नेता बनना संभव नहीं। भाजपा–संघ
ने पहले से ही जाति–आधारित नेतृत्व तैयार करने का काम शुरू कर रखा है। हिंदू समाज
पर उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी बढ़ा है। इसलिए आगे की राजनीति धर्म, हिंदुत्व, मुस्लिम–विरोध, जाति और प्रशासनिक वर्चस्व के आधार पर चलेगी और इसमें कौन
बाजी मारेगा, यह समझना कठिन नहीं।
दूसरी ओर कांग्रेस का राजनीतिक पतन दिखाई देता है। क्या वह
फीनिक्स की तरह फिर उठ पाएगी—यह बड़ा प्रश्न है। कांग्रेस की सत्तर वर्ष की सत्ता
और स्वतंत्रता आंदोलन में उसका योगदान बनाम भाजपा की ग्यारह वर्ष की सत्ता—इस
तुलना में भाजपा ने कम समय में बड़ा प्रभाव बनाया है। कांग्रेस में स्वतंत्रता काल
से ही संघ की ‘स्लीपर सेल’ सक्रिय रही होगी, अन्यथा संघ का
इतना विस्तार संभव नहीं था। कई कांग्रेसी अवसरवादी हैं और पार्टी की विचारधारा से
दूर। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को वैचारिक रूप से खड़ा करना राहुल गांधी के लिए
बड़ी चुनौती है।
कुल मिलाकर, महानगर पालिका चुनावों से
यह निष्कर्ष निकलता है कि महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भविष्य के चुनाव विपक्ष
के लिए आसान नहीं होंगे। “अगले पचास वर्ष हम ही सत्ता में रहेंगे” — ऐसा दावा करने वाले भाजपा को विपक्ष ने चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। सभी सीटों पर एक–एक संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने के लिए छोटे–बड़े सभी विपक्षी दलों में एकता आवश्यक है, अन्यथा पराजय की श्रृंखला
जारी रहेगी।
लेखक व
विश्लेषक
बापू राऊत,
9224343464
bapumraut@gmail.com

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