Wednesday, April 8, 2026

सम्राट अशोक के सांस्कृतिक इतिहास की उपेक्षा: ऐतिहासिक विस्मृति या एक राजनीतिक-सांस्कृतिक साजिश?


 भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक का स्थान एक ऐसे शासक के रूप में निर्विवाद है, जो सबसे अधिक भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक का स्थान एक ऐसे शासक के रूप में निर्विवाद है, जो सबसे अधिक प्रभावशाली और नैतिक मूल्यों पर आधारित था। उनके साम्राज्य की सीमाएँ लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली हुई थीं। इस विशालता के प्रमाण उपलब्ध शिलालेखों, स्तंभ लेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों से मिलते हैं। अशोक के आदेशों में व्यक्त उनकी दूरदृष्टि, शासन के सिद्धांत और 'धम्म' की अवधारणा को आधुनिक राजकाज के लिए आदर्श माना जाता है। उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा के केंद्र में अहिंसा और समानता को रखा, और जनता को नैतिक अधिकार प्रदान किया। उनके शासनकाल में, भारत पूरे विश्व के लिए 'विश्वगुरु' बन गया था।

भारतीय संविधान सभा ने भारत के इस महान सपूत को याद करते हुए राष्टीय प्रतिक के रूप में अशोक स्तंभ के सिंहो को चुना। यह केवल कलात्मक चयन नहीं था, बल्कि एक गहरा सन्देश था की भारत की पहचान शांति, न्याय और नैतिकतापर आधारित है। अशोक चक्र को राष्ट्रिय ध्वज में स्थान देना यह निरंतर गति, प्रगति और आधुनिकता के मार्ग पर चलने का प्रतिक है। इस प्रकार संविधान सभा का यह निर्णय दर्शाता है की, है कि भारत ने अपनी आधुनिक लोकतांत्रिक पहचान को अशोक कालीन प्राचीन मूल्यों से जोड़ा। यह अशोक की महानता और उनके आदर्शों की स्थायी प्रासंगिकता को उजागर करता है। लेकिन क्या वह यहाँ तक ही सीमित रहना चाहिए? केंद्र सरकार एंव महाराष्ट्र जैसे प्रगतशील राज्योने अशोक जयंती को राष्ट्रिय स्तर पर बड़े पैमाने पर मनाना चाहिए था। पाठ्यक्रमों में उनके जीवन और नीतियों को विस्तार से पढाया जा सकता था ।  अशोक के नैतिक मूल्यों और अहिंसा के प्रतिक के रूप में प्रस्तुत कर भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को अंतराष्ट्रीय मंचो पर मजबूत किया जा सकता है।

लेकिन फिर भी आज, भारतीय राज्य और ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक व्यवस्था लगातार अशोक को मुख्यधारा के इतिहास से हाशिए पर धकेल रहे हैं। उनके योगदानों की सरकारी तथा सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा नियमित रूप से उपेक्षा की जाती है।

अशोक को भुलाने का यह प्रयास केवल एक ऐतिहासिक चूक मात्र नहीं है; बल्कि यह आज के सत्ता-केंद्रों की मानसिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना से गहराई से जुड़ा हुआ है। अशोक की विरासत शासन के एक ऐसे मॉडल का प्रतिनिधित्व करती है जो समतावादी, अहिंसक, समावेशी और जन-केंद्रित है। यह आदर्शवाद, वर्चस्व-आधारित सांस्कृतिक राजनीति के लिए असहज करने वाला है।

2. अशोक का नैतिकता-आधारित शासन

अशोक के सभी शिलालेख तभी जारी किए गए जब उन्होंने बौद्ध धम्म को अपना लिया था। इन आदेशों के अनुसार, धम्म का अर्थ है अहिंसा, समानता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान। उनका प्रशासन पूरी तरह से इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार चलता था। शासन का यह मॉडल सीधे तौर पर जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी राजतंत्र के मूल सिद्धांतों को चुनौती देता है।

3. राज्य और ब्राह्मणवादी व्यवस्था अशोक की उपेक्षा क्यों करते हैं?

3.1 धम्म की राजनीति बनाम जातिगत पदानुक्रम

अशोक का धम्म समानता पर आधारित है और जाति व्यवस्था के विपरीत खड़ा है। दूसरी ओर, ब्राह्मणवादी शासन "दैवीय सत्ता" और "जातिगत व्यवस्था" पर टिका है। अशोक का सम्मान करने से जातिगत पदानुक्रम की वैधता पर सवाल उठते हैं। इसलिए, राज्य उन्हें मुख्यधारा से दूर रखता है।

3.2 अशोक ने धम्म के माध्यम से ब्राह्मणवाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेश की

बौद्ध धम्म का उपासक होने के बावजूद, अशोक ने सभी धर्मों को आश्रय और सम्मान दिया। उन्होंने पाखंडियों को संघ से बाहर निकाल दिया, पशु बलि पर आधारित अनुष्ठानों को अस्वीकार कर दिया, जातिगत पदानुक्रम को खारिज कर दिया, ब्राह्मणवादी धार्मिक एकाधिकार को चुनौती दी, और महिलाओं तथा वंचितों को स्थान दिया। इसलिए, आज के शासक और सांस्कृतिक अभिजात वर्ग महसूस करते हैं कि अशोक का महिमामंडन करने से उनका अपना वर्चस्व कमजोर हो जाएगा।

3.3 आर्य-केंद्रित' ऐतिहासिक आख्यान में अशोक के लिए कोई जगह नहीं है

भारतीय इतिहास को अभी भी वैदिक परंपरा के इर्द-गिर्द ही गढ़ा जाता है। यदि अशोक और उनके धम्म को सम्मानित ऐतिहासिक स्तंभों की सूची में रखा जाए, तो वेद-यज्ञ-दैवीय राजा का समीकरण धम्म-नैतिक राजा में बदल जाता है। वैदिक महाकाव्यों-गुप्त काल-राजपूत-मुगल-ब्रिटिश के पारंपरिक आख्यान में, बौद्ध स्वर्ण युग को जानबूझकर बाहर रखा गया है। अशोक को शामिल करने से वैदिक वर्चस्व की ब्राह्मणवादी प्रस्तुति बाधित होती है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अस्थिर हो जाता है।

3.4 अशोक की विरासत लोकतांत्रिक है, न कि दैवीय

अशोक ने कभी भी खुद को दैवीय राजा नहीं कहा। उनकी नैतिक जिम्मेदारी, लोगों के प्रति जवाबदेही और अहिंसा पर आधारित थी। इसके विपरीत, ब्राह्मणवादी विचारधारा को एक दैवीय राष्ट्र, दैवीय राजा और दैवीय संस्कृति की आवश्यकता होती है। अशोक इन सभी का विरोध करते हैं, यही कारण है कि ब्राह्मणवादी सत्ता संरचनाएं उनके खिलाफ खड़ी हैं।

3.5 अशोक की विरासत बहुजनों, महिलाओं और वंचितों को सशक्त बनाती है

अशोक ने महिलाओं को संघ में स्थान दिया, पीड़ितों की रक्षा की, और लोगों को नैतिक अधिकार प्रदान किए। उनकी विरासत बहुजन राजनीति को मज़बूत करती है, बहुजन जनता को इतिहास के केंद्र में रखती है, और समतावादी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देती है। इसलिए, ब्राम्हणवादी सांस्कृतिक प्रतिष्ठान को उनका गुणगान करना कठिन लगता है।

4. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अशोक को क्यों अस्वीकार करता है? – एक सांस्कृतिक विश्लेषण

4.1 अशोक के 'स्वर्ण युग' को स्वीकार करना वैदिक वर्चस्व को कमज़ोर करता है

अशोक का सम्मान करने का अर्थ है 'बौद्ध भारत' का सम्मान करना, जो 'वैदिक भारत' की श्रेष्ठता को चुनौती देता है। इसलिए, ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अशोक को "भारतीय सभ्यता के केंद्रीय व्यक्तित्व" के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।

4.2 अशोक की छवि ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के 'योद्धा राजा' के आदर्श के विपरीत है

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद युद्ध, वीरता, दिव्यता, पौराणिक महाकाव्यों और वर्चस्व पर फलता-फूलता है। अशोक के आदर्श—अहिंसा, नैतिकता, समानता, सत्य और लोक कल्याण—सीधे तौर पर उनके नैरेटिव (कथा) के विपरीत हैं। ये मूल्य वैदिक ब्राह्मणवादी विचारधारा के लिए असहनीय हैं।

निष्कर्ष

सम्राट अशोक की उपेक्षा कोई आकस्मिक ऐतिहासिक चूक नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक और सांस्कृतिक रणनीति है। अशोक की केंद्रीयता को स्वीकार करने का अर्थ होगा जाति-व्यवस्था का सामना करना, ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर सवाल उठाना, और शासन के एक लोकतांत्रिक, नैतिक तथा अहिंसक मॉडल को मान्यता देना। इस तरह का बदलाव समकालीन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वैचारिक नींव के लिए खतरा पैदा करता है।

सम्राट अशोक की विरासत भारत की आत्मा में गहराई से जुड़ी है। सरकारों ने उनके सम्मान में  जयंती के साथ शिक्षा, सांस्कृतिक उत्सव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार के माध्यम से उनके आदर्शों को और व्यापक रूप से फैलाया जा सकता है। अशोक को भारतीय सभ्यता के इतिहास के केंद्र में पुनर्स्थापित करना केवल एक इतिहास-लेखन संबंधी सुधार मात्र नहीं है, बल्कि वह एक राजनीतिक कृत्य है। अशोक के उपरोक्त यह माँग होनी चाहिए की, भारत के अतीत की पुनर्कल्पना दैवीय सत्ता और जातिगत पदानुक्रम के बजाय, समानता, अहिंसा और नैतिक शासन के दृष्टिकोण से की जाए। अशोक की विरासत का उत्सव मनाने के प्रति राजकीय संस्थाओं की अनिच्छा एक गहरी सभ्यतागत असुरक्षा को उजागर करती है और वह एक गहन ऐतिहासिक त्रासदी है।

 

लेखक: बापू राऊत, मुंबई

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