Friday, September 22, 2023

सुधारवादी हिंदूओंको धर्मविरोधी क्यों कहा जा रहा है?

एक अजब की स्थिति है. कुछ बाहरी लोगोद्वारा हिंदू धर्म के भीतर अपनी कुरीतिया, वर्णव्यवस्था, जातिप्रथा, आस्था और असमानता का बीजारोपण किया गया. जिससे हिंदू धर्म के मूल लोगोको अन्याय एंव अपमान जैसे परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. इन कुरीतिया एंव विषमता जैसे व्यव्हारोंको ख़त्म करना जरुरी है. सुधारोंका यह काम हिंदू धर्म के मूलनिवासी लोग करना चाहते है. जैसे ही मूल हिंदू अपने हिंदू धर्म के अंदर सुधारवादी बाते करने लगते, वैसेही बाहरी वैदिक उन्हें हिंदू विरोधी कहने लगते है. इतनाही नहीं, यह बाहरी हिंदू ८० प्रतिशत हिंदूओंका अपमान होने का दावा भी थोक देते है, जब की वे खुद हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है. फिर भी ये वैदिक ऐसा बर्ताव क्यों रहे है? इसके पीछे का राज क्या है?  इस सवाल के जवाब में कहा जा सकता है की, भारत में सनातनी वैदिक अल्पसंख्यंक है, लेकिन वे भारत की राजसत्तापर अपना अधिकार एंव वर्चस्व बरकरार रखकर उसे और बढ़ाना चाहते है, उन्हें पता है की, वे अपना वर्चस्व तबतक ही कायम रख सकते है, जबतक वे खुद को हिंदू कहना चालु रखे, मंदिरों एंव सांस्कृतिक रीतीरिवाज, वास्तुशास्त्रोंपर अपना वर्चस्व बरकरार रखे. उनके खुद के शास्त्र जैसे वेद, पुरानो और धार्मिक ग्रंथो को मूलनिवासी हिंदूओपर थोपे और सुधारवादी हिंदूओंके सुधारवादी प्रयासोंको हिंदू विरोधी कहकर हिंदुओ में अपनी पैठ ज़माकर अपने अस्तित्व और उनमे अपने विश्वास को अधिक मजबूत करना पड़े. इसी कारण से सामान्य हिंदू अपने दुसरे सुधारवादी हिंदू भाई के बातोपर विश्वास न करते हुए वे बाहरी वैदिक हिंदूओपर अधिक विश्वास करने लगते हुए मानसिक गुलाम, अंधविश्वासी  और अंधभक्त बन रहे है. इन्ही अंधभक्तो एंव मानसीक गुलामोंके बलबूते वे सत्तापर अपना कब्ज़ा बनाए रखे हुए है. और आगे भी शेकडो साल अपना वर्चस्व बनाए रखेंगे.  

 


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