Monday, November 16, 2020

भाजपा की जातीय राजनीति और धार्मिक तुष्टीकरण की सफलता

 भाजपा जाती की राजनीति नही करता, यह मिथ बिहार चुनाओ मे धाराशाही हुवा। यही नही, भारतीय जनता पार्टी आज भारत की सबसे बडी जातिवादी पार्टी बन गई है। धार्मिक के तुष्टीकरण के साथ साथ जातीवादी समीकरण ने उसे जितनेवाली पार्टी बना दिया है। केवल बिहार विधानसभा के चुनाव ही नहीं, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में हुए उपचुनाओ में भी भाजपा का यही स्ट्राइक रेट और नीति रही है।


नितीश कुमार की कुर्मी जाती वोटबँक, वही भाजपा की राजपूत, ब्राह्मण, ठाकुर और भूमिहार कोअर वोटबँक रही है। राष्ट्रीय जनता दल का सपोर्ट ग्रुप यादव, ओवेसी के एमआयएम पार्टी का मुस्लिम। फिलहाल ओवेसी की पार्टी सीमांचल, महाराष्ट्र और तेलंगना तक सीमित है। काँग्रेस की वोटबँक अब ना मुस्लिम है, ना ब्राह्मण, राजपूत और ना मागास वर्ग रहा है। काँग्रेस की यह हालत इसीलिए हुई है क्योंकि वह एकसाथ हिंदुत्व और सेक्युलर के तराजू पर खड़ी रहना चाहती है। बाबरी मस्जिद का दरवाजा खोलना और उसका गिरना यह हिंदू को खुश करना था वही शहाबानों केस में मुस्लिमो का तुष्टीकरण करना कॉंग्रेस पर भारी पड़ा। लेकिन इसका सीधा फायदा भाजपा और संघ ने उठाया। काँग्रेस के नेताओने कभी भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का विरोध नहीं किया। संघ के प्रभाव वाले साधुसंत के चरणोपर गिरने में काँग्रेस नेता कभी पिछे नहीं रहे। संघ समर्थक एनजीओ को कॉंग्रेस का समर्थन हमेशा रहा है।

बाबासाहेब आंबेडकर के बाद मा. कांशीराम ने भारत के राजनीति में बदलाव लाने काम किया। बामसेफ के संसाधनो द्वारा पिछड़े और अन्य पिछड़े के राजनीति को कामयाब किया। लिहाजा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में सफलता प्राप्त हुई। लेकिन उनके पश्चात बसपा की राजनीति घसरती गई। सोशल इंजीनियरिंग सत्ता की लालसा में किया गया ढोंग था। इसका सीधा फायदा भाजपा ने उठाया। बसपा के पिछड़े और अन्य पिछड़े  वोटबँक को सेंध लगा दिया। हर जाती का सेल बनाकर उसे भाजपा के साथ जोड़ दिया। यह भाजपा की नई एंव पूरक वोटबँक है। जो उनके कोअर वोटबँक से मिलकर विजयी फार्मूला बनाती है। दूसरी ओर पिछड़ो एंव अन्य पिछड़ो में तत्वहीन नए नेता और पार्टीयोंका निर्माण हो रहा, जिससे पिछड़ो की वोटबँक पूर्णतया बिखर गई। जनता के लिए सत्ता एंव सरकार बनाना इनका मकसद नहीं, बल्कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए केवल सत्ता में बने रहना अजेंडा होता है। इन नेताओ एंव पार्टियोंके साथ सीटो एंव पदो का तालमेल कर भाजपा चुनाओ में बाजी मार रहा है।

धार्मिक तुष्टिकरन कर हिंदूओंकों को भय एंव कंफ्यूज में रखना भाजपा और संघ का सुरू से ही अजेंडा रहा है। हिंदू–मुस्लिम, लव जिहाद, पाकिस्तान, गोरक्षा यह भाजपा के हमेशा के लिए चर्चित एंव स्थाई मुद्दे बन गए। चुनाओ में भाजपा को इससे खासा फायदा होता है। बेरोजगारी, शिक्षा, हेल्थ जैसे मुद्दे धर्म और जाती के सामने हार जाते है। उदाहरण के तौर पर बिहार विधानसभा चुनाओ को देखा जा सकता है।

चार्ट-1: बिहार विधानसभा 2020 में एनडीए का वर्गनिहाय प्रतिशत (%) वोट शेयर

 

अनु.जाती

अनु.जमाती

ओबीसी/ईबीसी

यादव

मुस्लिम

सवर्ण

भाजपा गठबंधन

40

50

50

10

5

60

सोर्स: politicalbaba.com

बिहार के पिछडी जातियोंमे मुख्यत: दलित, आदिवासी, कोयरी और निषाद जातीया आती है। अन्य पिछड़ोमे कुर्मी, कुशवाहा, यादव मुख्य जातीया है। इनका सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास नीचे पायदान पर है। तक्ता-1 के अनुसार यह जातीया भाजपा की बड़ी वोटबैंक बनकर उभरकर आई है। विधानसभा 2020 में भाजपा को अनु.जाती का 40% तथा अनु. जमातीयोंका 50% वोट शेयर मिला है। वही ओबीसी /इबिसी जातियोंका सहभाग 50% रहा है। यह पिछड़ोंके पार्टियों में हुए बिखराव के कारण मतदाता भाजपा के झोली में अपना वोट डालकर बाहर निकलता हुए दर्शाता है। वही सवर्ण जातीया भाजपा की कोअर वोटबँक रही है। भाजपा के लिए उनका वोट शेयर 60% है।

 

चार्ट- 2: जाती एंव वर्गनिहाय मतदान प्रतिशत (%) में

 

महागठबंधन

एनडीए

एलजेपी

तीसरा मोर्चा

इतर

ब्राह्मण

15

52

7

1

25

भूमिहार

19

51

3

<1

26

राजपूत

9

55

11

4

20

इतर उचि जाती

16

59

<1

<1

24

यादव

83

5

2

3

6

कुर्मी

11

81

3

<1

5

कोयरी

16

51

6

8

18

इतर ओबीसी /इबिसी

18

58

4

3

18

रविदास

34

27

9

13

18

दुसाध/पासवान

22

17

32

3

27

मुशहार

24

65

1

1

8

इतर  दलित

24

30

4

7

34

मुस्लिम

76

5

2

11

6

सोर्स : लोकनीति/सीएसडीएस सर्वे एंव इंडियन एक्सप्रेस 12 नवम्बर 2020  

चार्ट 2 के अनुसार महागठबंधन, एनडीए एंव तीसरे मोर्चे (बसपा+पप्पू यादव+उपेंद्र कुशवाहा+ओवेसी) को मिले जातीय वोट का  प्रबंधन समज सकते है। यादव और मुस्लिम समूह ने अपने वोट महागठबंधन के झोली में डाले। वही उचि जाती, कुर्मी, कोयरी एंव आर्थिक पिछडोने एनडीए को वोट किए। रविदास समूह को छोड़ अधिकतर दलित समूह (मूशहार 65%, दुसाध /पासवान 17 % एंव 32%, इतर दलित 30%) ने एनडीए को वोट किया। तीसरे गठबंधन (पप्पू यादव + बसपा+ उपेंद्र कुशवाह + ओवेसी ) को केवल रविदास 13%, मुस्लिम 11% एंव कोयरी 8% वोट मिले। बाकी दलीत समूहोने इस गठबंधन को ठुकरा दिया है। बिखरे हुए नेता एंव पार्टियोंने इस खतरे को समजना चाहिए। सीमांचल में मुस्लिम समूह ने महागठबंधन के बजाय ओवेसी के पक्ष में वोट दिये।  

भाजपा हर समुदाय में अपना सपोर्ट बेस बनाने में सफल हुवा है । यह प्रोग्रेसिव्ह पार्टीयोंके लिए नकारात्मक एकता का जवाब है। स्वार्थी नेताओ के लिए यह अनुकूल मौके हो सकते है, लेकिन समुदायो के लिए यह विनाश का कारण बन सकता है।  हाल ही में पत्रकार मीना कोतवाल ने बिहार चुनाव के समय  कुछ पिछड़ी जातियोंके बारे में रिपोर्टिंग की, जिससे भारतीय समाजव्यवस्था की असलियत दुनिया के सामने आई है। लेकिन इस भारतीय समाज व्यवस्था के आईने कौन समझेगा?

लेखक: बापू राऊत

bapumraut@gmailcom

9224343464 

Saturday, October 10, 2020

आंबेडकराइट नहीं अवसरवादी राजनेता थे रामविलास पासवान

भारत में ऐसा कोई नागरिक नहीं होगा जो रामविलास पासवानजी को न जानता हो। उन्होने अपने जीवन में सामाजिक और राजनीति की लंबी पारी खेली है। भारत में सबसे ज्यादा वोट के अंतराल से जीतनेवाले सांसद (1977) का रेकार्ड उनके नाम पर है। इतनाही नहीं छ: प्रधानमंत्री के साथ काम करने का अनूठा रेकार्ड भी उन्ही के नाम पर है। 1970-90 के दशक में जिन नेताओने राजनीति के मुख्य प्रवाह में सामाजिक न्याय का एजंडा लाने का काम किया, उन नेताओमे रामविलास पासवान का नाम शीर्षपर है । भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रतापसिंग के मंत्रिमंडलका चर्चित चेहरा थे रामविलास पासवान जी। मंडल आयोग और अनु जाती/जनजाति अत्याचार प्रतिबंध का कानून पर योगदान के लिए उन्हे सामाजिक न्याय का मसीहा भी कहा जाने लगा था।    

Saturday, October 3, 2020

हाथरस की घटना : आधुनिक इतिहास का काला पन्ना

भारतीय इतिहास का सांस्कृतिक चेहरा कभी भी सफ़ेद नहीं था। वह काला ही था। उसके उफान की लहरे कम अधिक होते रहती है। उत्तर प्रदेश के हाथरस में उसकी एक नई लहर दिखाई दी। जिस राज्य में रामराज के नामसे बेगुनाह लोगोंके अधिकारोपर चोट आती हो, उनके धार्मिक अधिकार नकारे जा रहे हो, वह राज्य किसी लोकतंत्र देश का हिस्सा नहीं हो सकता। उसे फॉसीवादी स्टेट ही कहा जाएगा।स्वतंत्र भारत में जहा लोकतंत्र और कानून का राज है, इतनाही नहीं दलितोंकों शोषण के खिलाफ संवैधानिक अधिकार मिले है। इस परिस्थिति में अगर राज्य और प्रशासन के द्वारा दलितोंके अधिकारो पर चोट की जाती हो, तब वह गंभीर बात हो जाती है। उसका मुक़ाबला गंभीरता और एकजुटता से करना बेहद जरूरी हो जाता है।

Wednesday, September 23, 2020

शेतकर्‍यांचे आंदोलन: कालचे व आजचे

 

खरे तर भारतासारख्या कृषिप्रधान देशात शेतकर्‍यांचे शोषण होणे ही फार लाजिरवाणी गोष्ट आहे. सत्ता कोणाचीही म्हणजे स्वतंत्र भारतातील असो वा पारतंत्र्यातील ब्रिटिशांची, शेतकरी हा कायमचा नागविला गेला आहे. शेतकर्‍यांना स्वत:चा आवाजच नसतो. त्यांना नेता नसतो. त्यांचा वापर करून नेता झालेले लोक सत्तेमध्ये गेल्यानंतर शेतकर्‍यांचे शत्रू व उद्योगपतीचे मित्र बनत असतात. हे तात्कालिक नेते शेतकर्‍यासाठी नीती बनविताना शेतकर्‍यांच्या अधिकच्या फायद्याचा विचार न करता सावकार, कॉर्पोरेट कंपन्या व मोठे उद्योगपती यांचेच अधिक फायदे बघत असतात. त्यांच्या अशा कारनाम्यामुळे हे तथाकथित शेतकरी नेते नंतर मालमाल झालेले बघायला मिळतात.

Saturday, September 19, 2020

हे आमचे गुरु नव्हेत !

 


हे आमचे गुरु नव्हेत ! अशा प्रकारची लेखमाला टिळकांनी केसरीतून लिहली होती. हे लेख केसरीतून १७ ऑक्टोबर १९०५, २४ ऑक्टोबर १९०५ आणि ७ नोव्हेंबर १९०५ रोजी प्रसिध्द झाले होते. हे लेख स्वदेशी चळवळीत पडणारे विद्यार्थी व त्यांच्या गुरूमधील परस्पर सबंध दाखविण्यासाठी लिहले होते.  हे आमचे गुरु नव्हेत, हे वाक्य त्यांनी डेक्कन कॉलेजचे ब्रिटिश प्रिन्सिपाल सेल्बी आणि शिक्षणतज्ञ मेकॅले यांना उद्देशून केले. हे गुरु यासाठी नव्हेत कारण, ते आपल्या विद्यार्थ्यास स्वदेशी व राष्ट्रीय चळवळीत सहभागी न होण्याचे व विद्याभ्यासाकडे लक्ष देण्याचे मार्गदर्शन करीत होते. राष्ट्रवाद हा धर्म व  जातीच्या गर्वाशी सबंधित नसून त्या त्या भूभागात राहत असलेल्या लोकांच्या एकात्मकतेच्या सहजीवनाशी निगडीत असल्याचे प्रतिपादन करीत होते. दुसरीकडे टिळक गुरूंच्या सन्मानाची भाषा करताना, आमच्या धर्मशास्त्रात पित्यापेक्षा गुरुस अधिक मान द्यावा असे म्हटल्याचे  सांगतात. ज्ञानासारखी जगात दुसरी कोणतीही पवित्र, वस्तु नाही; पण स्वार्थासाठी ज्ञानाच्या पुंजीचा विक्रम करण्यास जेव्हा एखादा मनुष्य तयार होतो तेव्हा त्याच्या ज्ञानास शुध्द व पवित्र ज्ञानाची किंमत देणे म्हणजे हिमालयातून गोमुखाच्या द्वारे पडणार्‍या गंगोदकांची  गटारातील पाण्याशी तुलना करणे होय ! असेही म्हणताना दिसतात.

Saturday, September 12, 2020

कर्मयोगी स्वामी अग्निवेश नहीं रहे !

स्वामी अग्निवेश जी 
अब, कभी हजारो की भगवाधारी भिड़ में मुझे कोई स्वामी अग्निवेश जैसा कोई स्वामी दिखाई देगा या नहीं ! पता नहीं ? लेकिन मुझे स्वामी अग्निवेशजी का न रहना हमेशा खलता रहेगा। स्वामी अग्निवेश जी का सामाजिक कार्य और उनके न डरते हुए बेबाक तरीकेसे बोलने के आजादी ने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया था।वे एक ऐसे संस्था से आते है, जहा चातुर्वर्ण्य और वेदो के मान्यता पर अधिक ज़ोर दिया गया था। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वेदपरंपरा और वैदिक धर्म को उच्चस्तर में रखनेका प्रयास किया। उन्होने पुराणोका विरोध कर हिंदुस्तान की जगह आर्यावर्त कहनेपर ज़ोर दिया था, इसी कारण पुणा के सनातनी लोगोने उनकी प्रतिकात्म्क तरीकेसे गधे पर बारात निकाली थी। महाराष्ट्र में विष्णुबुवा ब्रम्हचारी और न्या॰ महादेव रानड़े जैसे लोग आर्य समाज के शिष्योमेसे थे।  

Saturday, August 15, 2020

बाळ गंगाधर टिळक हे लोकमान्य कसे ? भाग २ (उत्तरार्ध)

टिळक, मी सुधारणांना पाठींबा दिल्यास माझ्या सार्वजनिक कार्यास बाधा येईल असे म्हणत. कधी सुधारणेस संख्येची अट घालत व नंतर त्यास नकार देत.  परधर्मीय व विदेशी मॅक्सम्युलरने वेद वाचले ते टिळकांना व त्यांच्या कर्मठ धर्मांधाना कसे चालले? पण तेच वेद आपल्याच ब्राह्मणेत्तर हिंदूनी वाचू नये आणि वेदांद्वारे संस्कार करण्याचा हक्क त्यांनी मागू नये असे म्हणणार्‍या टिळकांची नीती दोगलेपणाची असून ती आपल्याच हिंदू लोकाविरोधी होती. 

कायदेमंडळात जावून कुणब्याने नांगर हाकावयाचे नाहीत किंवा वाण्यांनी तागड्या धरावयाच्या नाहीत असे म्हणनार्‍या टिळकांनी सदैव तेल्यातांबोळ्याचे व शेतकर्‍यांचे नुकसान केले. त्यांना अशिक्षित व अज्ञानात ठेवून केवळ आपले पाठीराखे बनविले. पण याच तेलीतांबोळी व शेतकर्‍यांनी टिळकांच्या अथनीच्या सभेतील असभ्य वक्तव्यानंतर त्यांच्या पुढील सभा उधळून लावल्या होत्या. अहोरात्र कष्ट करून व अज्ञानी राहून अन्नधान्य पिकविणार्‍या शेतकर्‍यास शूद्र व कुणबट असे कुत्सितपणे संबोधणारे टिळक, गरिबी व शोषणामुळे सावकारांचे कर्ज फेडू न शकणार्‍या आपल्याच शेतकरी बांधवांना कारावासात पाठवा असे ब्रिटीशास सांगणारी व्यक्ति देशभक्त तरी कशी ठरू शकते? या विवेचनानुसार टिळकांचे स्थान कोठे असावे हे ज्यांनी त्यांनी आपल्या वैचारिक कुवतीनुसारच ठरविलेले बरे.

Saturday, August 8, 2020

बाळ गंगाधर टिळक हे लोकमान्य कसे ? भाग १

 

टिळकांचा १९१६-१९१९ हाच काळ थोड्याफार राजकीय प्रभावाचा होता. होमरूल लीग (१९१६), गोखलेंच्या मृत्यूनंतर कॉंग्रेसमध्ये पुनर्प्रवेश (१९१५) व लखनौ करार. ह्या त्यांच्या जमेच्या बाजू होत्या. वस्तूत: या करारातील मसुदा नामदार गोखलेनी १७ फेब्रुवारी १९१५ ला तयार केला होता. त्यानंतर दोनच दिवसात त्यांचे देहावसान झाले. त्यामुळे या मसुद्याला गोखलेचे राजकीय मृत्यूपत्र अशीही  संज्ञा दिली गेली. टिळकांनी मान्य केलेल्या लखनौ ठरावातील मुद्दे व करारातील बाबी त्यांचे कट्टरभक्त असलेल्या बाळकृष्ण मुंजे, देशपांडे, अणे आणि एन.सी. केळकर यांना पसंत नव्हते तसेच मदनमोहन मालविय व वाय.सी.चिंतामणी या मवाळांनाही मान्य नव्हत्या. हिंदू सभावाल्यांनी तर टिळकांवर आपला रोष व्यक्त केला होता.

 

टिळकांनी आपल्या हयातभर सुधारकांची बदनामी व त्यांच्या कार्यावर टीका करण्यात आपली शक्ति व वेळ खर्च केला. गोपाळकृष्ण गोखले, न्या. रानडेवर व अन्य कॉंग्रेस नेत्यावरील अनिष्ट टीकेमुळे ते कॉंग्रेस पासून दूर फेकल्या गेले होते. संमतीवयाचे विरोधक व कर्मठांचे पाठीराखे अशी त्यांची प्रतिमा बनल्याकारणाने कामगारवर्ग त्यांच्याकडे कामगार पुढारी म्हणून नव्हे तर ब्राह्मण पुढारी म्हणूनच पाहत असत. मुंबई पुण्याच्या श्रमिक वर्गात सत्यशोधक समाजाचे वर्चस्व होते. त्यामुळे कामगारवर्ग दुसर्‍या राजद्रोहापर्यंत त्यांच्याशी अनुकूल नव्हता. पहिल्या आंतर्राष्ट्रीय कामगार परिषदेसाठी (ऑक्टोबर १९१९) भारतीय कामगारांचे प्रतींनिधी म्हणून काही पुढार्‍यांनी पुढे केलेल्या टिळकांच्या नावाला कामगार हितवर्धक सभेने विरोध केला होता. तर १९२० च्या वॉशिंग्टन मधील लेबर कॉंग्रेससाठीचा सहभागही कामगार संघटनाच्या विरोधामुळे त्यांना सोडावा लागला होता.

 

टिळक १८८९ ला कॉंग्रेसच्या दख्खन शाखेचे सचिव होते पण कर्मठ ब्राह्मणांचे पुढारी अशीच त्यांची प्रतिमा होती. त्यांच्या संपूर्ण राजकीय जीवनात त्यांच्या भांडखोर व जहाल स्वभावामुळे कॉंग्रेसचे अध्यक्षपद मिळू शकले नाही. १९१४ साली मंडालेच्या तुरुंगातून सुटून आल्यानंतरही सर्वसमावेशक भूमिका न घेता ब्राह्मण समाजाच्या हितांचे प्रश्न व कर्मठ विचारासोबतच सबंधित राहिले. चिरोल प्रकरणामुळे त्यांची विदेशात व भारतातही पुरती नाचक्की झाली होती. कट्टर समर्थक असलेल्या अनुयायांनी त्यांच्या हयातीमध्येच आपल्या निष्ठा बदलत गांधी गटात पळापळ करण्यास सुरुवात केली होती. एवढेच नव्हे तर, दिवसेंदिवस गांधीच्या  वाढत्या प्रभावामुळे येथे कामच नाही तर रहा तरी कशाला यांनी अशी नामुष्की स्वत:स वाटून वर्ष दीड वर्ष विलायतेस जावून राहण्याची इच्छा व्यक्त करणार्‍या टिळकांना “लोकमान्य” ही बिरुदावली खरेच शोभून दिसेल काय? याचाही विचार व्हावयास हवा.? (संदर्भ: टिळकांचे पाठीराखे परंतु नंतर गांधी गोटात गेलेले कृष्णाजी खाडीलकर यांच्या सोबत झालेला वार्तालाप )

 

Monday, July 27, 2020

अरुणाचल प्रदेशातील बदलती लोकसंख्या वाढ आणि धर्मांतरे

अरुणाचल प्रदेश हे भारतातील उत्तर पूर्व साखळीतील एक राज्य असून १९७२ पर्यंत या राज्याला नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजंसी (नेफा) असे संबोधल्या जात असे. अरुणाचलच्या दक्षिणेस आसाम आणि नागालँड राज्यांच्या सीमा आहेत तर पश्चिमेकडे भूतान, पूर्वेस म्यानमार आणि उत्तरेस चीन (तिबेट) यांच्या भूभागानी वेढलेले आहे. मॅकमोहन लाइन ही भारत व चीन मधील

Saturday, July 18, 2020

तुर्कस्थानमे इस्लामी मूलतत्ववाद का उच्छाद: चर्च, मस्जिद और म्युझियम से मस्जिद तक


अब दुनिया में एक नए विषय पर चर्चा हो रही है। इसपर दुनिया भर से आलोचना भी हो रही है। वह विषय है हागिया सोफिया। हागिया सोफिया एक कॅथेड्रल (चर्च) का नाम है। यह तुर्की के पूर्वी शहर कॉन्स्टेंटिनोपल शहर के मध्य में 532 में बनाया गया था। यह गिरजाघर (चर्च) दुनिया के सबसे पुराने और भव्य गिरिजाघरों में से एक था। हागिया सोफिया का अर्थ है "पवित्र विवेक"। इस गिरजाघर की यात्रा रोमांचक है। पहला, उसका निर्माण गिरजाघर स्वरूप में था, बाद में उसे मस्जिद में रूपांतरीत किया गया। फिर, उसी मस्जिद को म्यूझियम में बदल दिया गया था। अब एर्दोगन की तुर्की सरकार ने उसे फिर मस्जिद में परिवर्तित करने की घोषणा की है। तुर्कस्थान का यह वाकया भारत के अयोध्या विवाद के समकक्ष दिखाई देता है। मंदिर के लिए आंदोलन द्वारा बाबरी मस्जिद का विध्वंस बादमे अदालत का फैसला। इस दृष्टि से, तुर्कीके हाज़िया सोफिया का मामला और अयोध्या विवाद के बीच अधिक समानताएं दिखती हैं।

Friday, July 17, 2020

तुर्कस्थानातील इस्लामी मूलतत्ववाद: चर्च, मस्जिद व म्युझियम ते मस्जिद


जगात सध्या एक नवीन विषय चर्चिला जात आहे. त्यावर जगातून विरोधी प्रतिक्रिया सुध्दा उमटत आहेत.  तो विषय म्हणजे हागिया सोफिया. हागिया सोफिया हे नाव आहे एका कॅथेड्रल्सचे (चर्चचे ), जी  चर्च इ.स. ५३२ मध्ये तुर्कस्थानच्या पूर्वीच्या कॉन्स्टँटिनोपल या शहराच्या मध्यभागी बांधल्या गेली होती. हे कॅथेड्रल्स (चर्च) जगातील सर्वात जुन्या आणि भव्य कॅथेड्रल्स पैकी एक होती. हागिया सोफियाचा अर्थ होतो "पवित्र विवेक". या कॅथेड्रलचा प्रवास म्हणजे प्रथम तिचे कॅथेड्रल चर्च म्हणून झालेले बांधकाम, नंतरच्या काळात तिचे मस्जिद मध्ये परिवर्तन. त्याच मस्जिदीचे एका वास्तु संग्रहालयात रूपांतरण तर आता परत एर्दोगनच्या तुर्की सरकारकडून मस्जिद मध्ये परिवर्तीत करण्याची झालेली घोषणा. भारतात मंदिरासाठी जनक्षोभ भडकावून केलेले आंदोलन. त्यातून बाबरी मस्जिदीचा झालेला विध्वंस व न्यायालयाचा निकाल ह्या बाजू बघितल्या की तुर्कस्थानामध्ये होत असलेले हाजिया सोफिया प्रकरण व अयोध्या विवाद यात अधिक साम्यता बघायला मिळते.

Saturday, June 27, 2020

शाहू राजेंच्या "वेदोक्तास" टिळकांचा विरोध


देशात व विशेषत: महाराष्ट्रात शिवाजी राजेनंतर राजेशाहीतील सर्वात चर्चित व्यक्ती कोणी राहिली असेल तर ती कोल्हापूर संस्थानाचे “राजश्री शाहू” होत. शिवाजी राजे व शाहू राजे यांचे कार्य व विचार पध्दतीमध्ये काही मुलभूत फरक दिसतात. ब्राह्मणी संस्कृती व तिची विचारधारा, ब्राह्मणी संस्कृतीचे भय व न्यूनगंड तसेच अस्पृश्यता व जातीभेद याचे निराकरण या कसोट्यांवर या दोन राजांची कर्तव्यकठोरता तपासली तर या दोन व्यक्तिमत्वातील फरक स्पष्ट जाणवतो. ब्राह्मणवर्ग राबवित असलेल्या धर्मसहिंतेवर आघात करणे शिवाजी राजेंना जमले नाही. शाहू राजेंनी मात्र यात कसलीही कसर बाकी ठेवली नाही. शिवाजी राजेंनी मुघलाकडून झालेल्या अपमानाचा समाचार घेण्यात बाणेदारपणा दाखविला परंतु स्व‍कीयाकडून झालेला अपमान त्यांनी धर्मसहिंतेच्या नावाखाली पचवून टाकला.

Wednesday, June 10, 2020

सुधारकांच्या कथनी व करणीतील दांभिकता


हिंदू समाज धर्मग्रस्त तर होताच पण त्याहीपेक्षा धर्माचरणाने भयंकर विकृत रूप धारण केले होते. स्वधर्मीयाबद्दलची सहिष्णुता सुद्धा लोप पावली होती. मानवतेला काळिमा फासणार्‍या गोष्टी होत होत्या. अन्याय व अत्याचाराच्या पर्वात समाजाचा काही भाग जगत होता. अशा समाजांचे अधिकार गोठविण्यात आले होते. अनिष्ट रूढीना धर्म व शास्त्राची मान्यता लाभली होती. त्याहीपेक्षा राजकारण करणारे पूर्वगौरववादी व कर्मठ असल्यामुळे अत्यंत अमानवीय अशा वाईट प्रथाही त्यांच्यासाठी गौरवाच्या झाल्या होत्या. सतीची चाल, विधवावरील जुलूम, बालविवाह, मुलींची विक्री, केशवपन, मूर्तिपूजेचे स्तोम, स्त्रीशिक्षणावर बंदी, ब्राह्मणेत्तर बहुजन समाजाच्या शिक्षणावर बंधने, अस्पृश्य वर्गाचे गावकूसाबाहेरचे दरिद्री जीवन आणि अंधश्रध्दांच्या महापुराने मानवी जीवनाला विळखा घातला होता. ह्या अमानवीय प्रथा व पध्दतीचा विरोध करण्यासाठी सुधारकांचा गट पुढे आला होता. या सुधारकांनी धर्मशास्त्रातील कलमांची उकल करून त्यातील अंतर्भाव लोकास सांगण्यास सुरू केले. त्यांनी इंग्रज सरकारकडे सुधारणासाठी नवे कायदे करण्याची मागणी केली. परंतु या सुधारकांना विरोध करण्यासाठी काही दुर्धारक समोर आले होते. या दुर्धारकांचे नायक होते विष्णुशास्त्री चिपळूणकर व बाळ गंगाधर टिळक.

Tuesday, May 26, 2020

टिळक व गांधी : राजकीय सत्ता संघर्षातील विरोधाभासी केंद्र

टिळक व गांधी या दोहोंमध्ये एक मूलभूत फरक होता. अस्पृश्योद्वार झाल्याशिवाय भारत स्वातंत्र्य होणार नाही ही गांधीची ढोंगी विचारसरणी तर ब्राह्मणांनी कौन्सिलात गेल्याशिवाय देशोद्वार होणार नाही ही टिळकांची जातीश्रेष्ठतेची भूमिका. देशाच्या राजकारणांची व ब्रिटीशविरोधातील आंदोलनाची सर्व सूत्रे ही आपल्या हातामध्ये असावी याची सुप्त धडपड दोघांच्याही अंतरंगात होती. रानडे व गोखले यांचेकडून राजकीय सूत्रे आपल्या हातात घेवू पाहण्याची टिळकांची नीती तर राष्ट्रीय राजकारणातून टिळकांना घालविण्याची गांधीची व्युव्हरचना,  दोघांची ही पध्दत वेगळी असली तरी उद्देश मात्र एकच होता आणि तो म्हणजे एकमेकांना राजकारणातून घालविण्याचा.  

Wednesday, April 8, 2020

महात्मा ज्योतिबा फुले : एक थोर समाजक्रांतिकारक


लोकहितवादी, महादेव रानडे, गोपाळ गणेश आगरकर, बाळशास्त्री जांभेकर हे महात्मा फुल्यांच्या समकालीन सुधारक होते. परंतु हे सुधारक हे बहुजन समाजाविषयी केवळ शब्दामधून उसासे व सहानुभूती दाखवत. हे सुधारक आपल्या सुधारकी विचाराच्या विरोधी कृतीही करीत असत. पण ज्योतिबा फुले अशा सुधारक फळीतील नव्हते. 'बोले तैसा चाले' हा त्यांचा बाणा होता.  ब्राम्हणेत्तराना जागे करण्याबरोबरच ब्राम्हण महिलावर होणार्‍या अन्यायाच्या निर्मूलनाला सुद्धा त्यांनी आपले कर्तव्य समजले.

Thursday, April 2, 2020

प्लेग, टिळक, चाफेकर बंधू आणि आजचा कोरोंना


आज संपूर्ण जगाला कोरोंना विषाणूनी वेढलेले आहे. शक्तीशाली व विकासात अग्रेसर समजले जाणारे अमेरिका, इटली, स्वीडन, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, कॅनडा व ब्रिटन हे देश या कोरोंना विषाणूने पुरे हबकले आहेत. त्यांच्या आर्थिक व्यवस्थेचे कंबरडे मोडायला लागले आहे. आधुनिक तंत्रज्ञान व आरोग्य सोईनी सशक्त असलेल्या या देशात लाखो लोक विषाणूनी संक्रमित होवून हजारो जन मृत्यूमुखी पडत आहेत. हा विषाणू जगासाठी एक धोक्याची घंटाच असून जगाची आर्थिक स्थिती व समीकरणे बदलविणारा  ठरू शकतो.

Wednesday, March 4, 2020

लेण्यांद्री लेण्याचे विद्रुपीकरण


महाराष्ट्रातील पुणे जिल्ह्यातील जुन्नर हे शहर. प्राचीन काळापासून प्रसिध्द असलेल्या या शहराला लेण्याचे शहर असे म्हटले जाते. जुन्नर हे ‘हीनयान’ बुध्दीझमचे मोठे केंद्र होते. सातवाहन काळात जुन्नर हे पुणे शहरापेक्षा मोठे केंद्र असावे. पूर्व काळात येथील व्यापार हा नाणेघाट ते कल्याण अशा मार्गाने चालत असे. या शहराच्या आजूबाजूला असलेल्या पर्वतरांजीत लेण्यांच्या मालिकाच मालिका आहेत. डोंगरातील खडकांना काटून लेण्या कोरलेल्या आहेत. अशाच अनेक लेण्यांपैकी येथील लेण्यांद्री हि एक प्रसिध्द लेणी. लेण्यांद्री लेण्यावर जाण्यासाठी ३०७ पायऱ्या चढून जावे लागते. ह्या लेण्याची सुरक्षा व देखभाल भारतीय पुरातत्व विभाग करते. परंतु तेथील परिस्थिती बघितल्यास या भारतीय पुरातत्व विभागा विषयी मनात निराशा निर्माण झाल्याशिवाय राहत नाही. कारण हजारो वर्षाच्या या सांस्कृतीक धरोहारीला भारतीय पुरातत्व विभागाने पूर्णपणे दुर्लक्षित ठेवले असून एकूण २६ लेण्यापैकी केवळ ७ नंबरची लेणी सोडली इतर लेण्या बघण्यासाठी चांगली सोय केलेली दिसत नाही.  

Monday, February 17, 2020

शिवरायांचा आठवावा प्रताप


आज  देश कधी नव्हे एवढा धोक्याच्या वळणावर उभा आहे. देशाला अनेक समस्यांनी ग्रासले असून एक नागरिक दुसर्‍या नागरिकाकडे संशयित भावनेतून बघायला लागला आहे. रोजचे मोर्चे व आंदोलनानी रस्ते आणि चौक गजबजलेले दिसताहेत. मागण्यांचे फलक हातामध्ये धरून मार्च निघताहेत. भारतासारख्या धर्मनिरपेक्ष देशात जिला जगातिल सर्वात मोठ्या लोकशाहीचा गौरव प्राप्त झाला आहे. त्या देशात  धर्म,परंपरा व वर्चस्वाच्या नावाने मत्सर भावना वाढाव्यात हे देशास हीन करणार्‍या कृती आहेत. राजकीय स्वार्थासाठी धूर्त मंडळी धर्म व जुने इतिहासाचे दाखले व भाकडकथावर विश्वास ठेवून भारतीय नागरिकात द्वेषाचे बिजारोपण करून हिंदू व मुस्लिम यांच्यात दरी निर्माण करण्याचे कारस्थान रचनार्‍यानी एकदा तरी शिवरायाच्या राज्यरचनेचा व जनतेचा सांभाळ करण्याच्या वृत्तीचा अभ्यास करायला पाहिजे.